ওয়া আলাইকুমুস-সালাম ওয়া রাহমাতুল্লাহি ওয়া বারাকাতুহু।
বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহিম।
জবাবঃ-
আলহামদুলিল্লাহ!
আবূ হুরাইরাহ (রাঃ) কর্তৃক বর্ণিত,
وَعَنْ أَبيْ هُرَيْرَةَ قَالَ : قَالَ رَسُولُ اللهِ ﷺمَا مِنْ يَوْمٍ يُصبِحُ العِبَادُ فِيهِ إِلاَّ مَلَكَانِ يَنْزِلاَنِ فَيَقُولُ أحَدُهُمَا: اَللّٰهُمَّ أعْطِ مُنْفِقاً خَلَفاً وَيَقُولُ الآخَرُ : اَللّٰهُمَّ أعْطِ مُمْسِكاً تَلَفاً متفقٌ عَلَيْهِ
তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, প্রতিদিন সকালে দু’জন ফিরিশতা অবতরণ করেন। তাঁদের একজন বলেন, হে আল্লাহ! দাতাকে তার দানের বিনিময় দিন। আর অপরজন বলেন, হে আল্লাহ! কৃপণকে ধ্বংস দিন।(বুখারী ১৪৪২, মুসলিম ২৩৮৩,মিশকাত-১৮৬০)
এখানে দানকারীর ফযিলত ও কৃপণের জন্য বদদু'আ বর্ণিত হয়েছে। এখানে দৈনিক দান করা উদ্দেশ্য নয়।বরং যাদের ভালো ও উত্তম কাজে খরচ করার মনমানসিকতা রয়েছে, তাদের জন্য ফেরেশতারা দু'আ করেন। আর কৃপণদের জন্য বদদু'আ করেন। দৈনিক দান করা শর্ত নয়। হ্যা, সময় সুযোগ থাকলে যাদের দান করার সুযোগ রয়েছে, তাদের জন্যই এই দু'আ।
وف مرقاة المفاتيح:
(وعنه) أي: أبي هريرة (قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم -: ما من يوم) ما نافية ومن زائدة لتأكيد الاستغراق، والمعنى ليس يوم ( «يصبح العباد فيه» ) صفة يوم (إلا ملكان) مبتدأ خبره (ينزلان) أي: فيه، وهذه الجملة مع ما يتعلق بها في محل الخبر وهو مستثنى من محذوف، أي: على وجه إلا هذا الوجه؛ ذكره الطيبي (فيقول أحدهما) أي: لمن أنفق ماله في الخيرات ( «اللهم أعط منفقا» ) أي: من محله في محله، وأطلق مبالغة في مدح الإنفاق (خلفا) أي: عوضا عظيما وهو العوض الصالح أو عوضا في الدنيا وبدلا في العقبى لقوله - تعالى - {وما أنفقتم من شيء فهو يخلفه وهو خير الرازقين} [سبأ: ٣٩] (ويقول الآخر) للآخر الذي لم ينفق في مرضاة المولى ( «اللهم أعط ممسكا» ) أي: عن خيره لغيره (تلفا) أي: لماله حسا أو معنى، وفي إيراده بلفظ الإعطاء مشاكلة (متفق عليه) (مرقاة المفاتيح :ج:٤،ص:١٣١٩)